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- Book written by Divya Prakash Dubey.
- ISBN: 978-93-87464-95-7
- Started : 10th December, 2025 - Finished : 31th December, 2025
माँ,जो कभी एक बीस बरस की लड़की थी, उस लड़की के नाम।
इब्नेबतूति: कुछ सुंदर शब्द कभी शब्दकोश में जगह नहीं बना पाते। कुछ सुंदर लोग किसी कहानी का हिस्सा नहीं हो पाते। कुछ बातें किसी जगह दर्ज नहीं हो पातीं। कुछ रास्ते मंज़िल नहीं हो पाते। उन सभी अधूरी चीज़ों, चिट्ठियों, बातों, मुलाक़ातों, भावनाओं, विचारों, लोगों के नाम एक नया शब्द गढ़ना पड़ा।
Pg.11 - एक ख़ास उम्र में लड़के बाइक चलाते नहीं उड़ाते है| प्यार का इज़हार राघव ने अपनी बाइक पर बैठकर हज़रतगंज में शुक्ला जी की वर्ल्ड फेमस चाट खाते हुए किया था| - ‘‘मारेंगे दस, गिनेंगे एक’ लखनऊ की प्राचीनतम और ज़रूरी परंपराओं में एक रहा है। - इतने मॉल थे, इतने कॉफी हाउस, इतने पार्क, इतने पिक्चर हॉल कि अगर ऐसे बदले हुए माहौल में कोई अब भी हपककर प्यार नहीं कर पा रहा तो यह सिस्टम, समाज, दुनिया की नहीं उसकी खुद की गलती थी। अब प्यार को छत पर कपड़े सुखाने का, पतंग उड़ाने का इंतज़ार कहाँ करना पड़ता था! अब व्हाट्सएप में लास्ट सीन से जुड़ती हुई दुनिया क्या जाने कि चिड़ियों और पत्तियों का इंतज़ार क्या होता था!
Pg.12 अवस्थी परिवार शहर के एकदम मिडिल में पड़ता था और मोहल्ले के ज्यादातर लोग लोअर मिडिल क्लास से मिडिल क्लास के बीच के थे। वैसे भी शहर बड़ा हो या छोटा, अमीर लोग शहर के एक कोने में रहते हैं।
Pg.13 - हालाँकि राघव जब बात करता तो लगता नहीं कि कभी अंग्रेजी बोल भी सकता था लेकिन लखनऊ के महानगर ब्वाय्ज़ जितनी अच्छी लखनउआ भाषा बोल लेते, उतनी ही अच्छी अंग्रेजी| - हालाँकि शालू मन-ही-मन नहीं चाहती कि लड़का इतनी कम उम्र में उनसे दूर हो जाये| दुनिया की सभी माएं अपने बच्चों से इतनी बातें करती है लेकिन अपने मन कि बात कहने में उनके पास भाषा काम रह जाती है| हर माँ अपनी मर्जी को, बच्चे कि खुशी से तौलती है और बच्चे की खुशी वाला पलड़ा चाहे हल्का हो या भारी इसकी नौबत आती है नहीं क्योंकि माँ के तराजूँ में दोनों तरफ़ बस बच्चे कि खुशी का ही पलड़ा होता है|
Pg.15 - राघव ने जब निशा से बात ख़त्म करके घड़ी देखी तो सुबह के 6 बज चुके थे। राघव या निशा से कोई पूछता दो घंटे बात क्या हुई तो बता पाना मुश्किल है और समझा पाना भी। - “सूरज को उगते हुए देखकर इतना अच्छा लग रहा है, सोच रहा हूँ कि हफ्ते में एक दिन जल्दी उठा करें।” निशा सुबह उठकर एक्सरसाइज़ किया करती थी। उसने पार्क में भागते हुए जवाब दिया। “एक दिन उठा है एंजॉय कर, सुबह जल्दी उठने जैसे ऐसी बड़ी-बड़ी चीज़ें मत सोच|” - चाय मेज़ पर रखकर वह शालू के हाथ पर सिर रखकर लेट गया। शालू की नींद खुल चुकी थी। हाथ पर सिर रखते ही राघव को नींद का एहसास हुआ।
Pg.16 राघव की यह बात सुनते हुए शालू को खुशी से कूद पड़ना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह सोच में डूब गई। अक्सर होता है न कि जहाँ के लिए हम चले थे, वहीं पहुँचते ही याद आता है कि पहुँचने की वजह खो चुकी है।
Pg.23 “अरे, आपको बोला था यह तो नेताजी के रिश्तेदार हैं। इनका काम क्यों रोक लिया?” “सर, वो पेपर वर्क कम्प्लीट नहीं था। इससे कल को हमारी नौकरी चली जाती, कोई बात नहीं, आप पर भी इस पर उँगली उठ सकती थी।” शालू के बताने के अंदाज़ से ही पता चल रहा था कि यह सफेद झूठ है। शालू की यह आज़माई हुई ट्रिक थी। जब भी कोई गलत काम न करना हो तो उसको ऐसे बता दो कि सर इससे तो आप पर भी उँगली उठ सकती है। कोई सरकारी अधिकारी कभी इस बात के लिए हाँ नहीं कर सकता कि ‘कोई बात नहीं, हम पर उँगली उठ जाने दो, तुम यह काम कर दो।’ अधिकारियों को ट्रेनिंग इस बात की दी जाती है पता नहीं लेकिन हर अधिकारी इस बात की ट्रेनिंग ले ही लेता है कि कागज़ पर सब कुछ ठीक कैसे रखना है। यह देश कागज़ पर ठीक था, ठीक है और ठीक रहेगा। इस देश की समस्याएँ भी केवल कागज़ पर ही ठीक की जा सकती हैं।
Pg.25 प्रिंसिपल सेक्रेट्री की मीटिंग में वही हुआ जिसका डर था। उसने श्रीवास्तव जी को इतना बेइज़्ज़त किया कि श्रीवास्तव जी कहीं पर भी मुँह दिखाने लायक नहीं बचे थे। इस मीटिंग का समय तय हुआ था कुल एक घंटे का, लेकिन मीटिंग पूरे 4 घंटे चली।
Pg.25 उसने बड़े बाबू को फ़ोन किया। “कहाँ हैं आप?” “हमें लगा मैडम कि आज आप लोग अब लौटकर आएँगे नहीं इसलिए हम चले आए।” “कोई बात नहीं। घर पहुँच गए हैं?” “जी मैडम।” “कोई बात नहीं, एक काम करिए। तुरंत से पहले ऑफिस आ जाइए।” “क्या कह रही हैं मैडम?” “हमने कहा कि बड़े बाबू साहब, आप तुरंत से पहले ऑफिस चले आइए। कोई दिक्कत तो नहीं आने में?” बड़े बाबू सन्न थे। ढंग से वह मौके की नज़ाकत समझ गए और अपने घर पर बीवी के सामने ही फ़ोन पर हाथ रखकर हवा में दो-चार गालियाँ से गुस्सा निकालकर ऑफिस के लिए चल दिए। चलने से पहले अपने मन में बुदबुदाए भी— “सरकारी नौकरी साली परसेंट से बुरी हो गई है।” बीवी ने तंज कसा, “एक दिन तो जल्दी आए थे, आज फिर पीने निकल लिए?”
Pg.33 डॉक्टर यह कहकर आगे बढ़ गया। राघव की नज़र पहली बार इमरजेंसी में पड़ी। हर चेहरा परेशान था। अस्पताल मंदिर जैसे होते हैं, यहाँ भगवान के नहीं अपने दर्शन होते हैं।
Pg.33 शालू की एक आदत थी—वह बाकी माँओं की तरह कभी पढ़ाई की बात नहीं करती थी। साधारण-सी ऑर्डिनरी बातें ही करती थी।
Pg.45 ऐसी कहावत है कि घर में एक आईएएस हो गया तो सात पुश्तें तर जाती हैं।
Pg.45 वैसे भी सपने दो बार पूरे होते हैं, एक तब हम उसके बारे में सोच लेते हैं और दोबारा सच में।
Pg.45 अगर आलोक को पता चलता कि किसी ने UPSC का इंटरव्यू दे रखा है तो उनसे मिलकर वह सारे सवालों के जवाब सुनता और अपने उन्हीं सवालों के अपने जवाब बनाता। बनाता इसलिए क्योंकि बिहार का आदमी सवाल सॉल्व नहीं करता, सवाल बनाता है।
Pg.49 इसी बीच किसी ने पीछे से टोंट कसा, “कॉलेज की डिबेट नहीं कि कुछ भी ज्ञान पेलते रहोगे आलोक। ये कॉलेज की परंपरा की बात है।”
Pg.50 स्पेशल चाय आ चुकी थी। एक सिप लेने के बाद कुमार आलोक ने कहा, “हमने कभी सोचा ही नहीं कि हमारा नहीं होगा, लेकिन आपका सवाल अच्छा है। हम सोचकर बताएँगे।”
Pg.51 जैसे कि दो-तीन बार रिवाइंड करने के बाद कुमार आलोक को याद आया है कि रुमाल शालू के पास ही छूट गया है। उसने अपनी बाईं जेब में ऐसे हाथ डाला जैसे कि रुमाल अब भी वहीं हो। उसको रुमाल से खाली हुई जगह बहुत अच्छी लगी।
Pg.52
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