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- Book written by Divya Prakash Dubey.
- ISBN: 978-93-92820-40-3
- Started : 13th September, 2025 - Finished : 18th September, 2025
हम सभी की जिंदगी में कुछ ऐसी कहानियाँ होती हैं जिन्हें अगर हम न सुनाएँ तो पागल हो जायेंगे| ऐसी ही एक कहानी के नाम।
ब से पहले की बात
Pg.7 इसीलिए ज़िंदगी को सही से समझने के लिए किताबें ही नहीं, बातें भी पढ़नी पड़ती हैं।
Pg.7 बातें दुनिया के तमाम खूबसूरत जरूरी चीजों जैसी हैं, जो कम से कम दो लोगों के बीच हो सकती हैं| बातें हमारे शरीर का वो जरूरी हिस्सा होती है जिसको कोई दूसरा ही पूरा कर सकता है। अकेले बड़बड़ाया जा सकता है, पागल हुआ जा सकता है, बातें नहीं की जा सकतीं।
Pg.7 बातें ही क्या वो सबकुछ जो लिखा हुआ नहीं है, वो सबकुछ जो किसी ने सिखाया नहीं। I think this statement is wrong. This line is very complex to understand without any punctuations. ChatGPT interprets it as:
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 | |
Pg.8 उन टुकड़ों को मैंने वैसे ही पूरा किया है जैसे आसमान देखते हुए हम तारों से बनी हुई शक्लें पूरी करते हैं। हम शक्लों में खाली जगह अपने हिसाब से भरते हैं इसलिए दुनिया में किन्हीं भी दो लोगों को कभी एक-सा आसमान नहीं दिखता। हम सबको अपना- अपना आसमान दिखता है।
क से कहानी
Pg.8 ये सुनकर मैंने चाय के कप से एक लंबी चुस्की ली और कहा, “मजाक अच्छा कर लेती हैं आप!”
ब से बेटा शादी कर ले
Pg.11 तुम लोगों को शादी के बाद जब लड़की से केवल बच्चे पलवाने हैं तो वर्किंग वुमेन चाहिए ही क्यूँ, नहीं बताओ? …ब्ला ब्ला ब्ला।
एक से एक दिन की बात
Pg.12 “Wow! मैं आज पहली बार किसी लड़की लॉयर से मिल रहा हूँ। सही में डिवोर्स करवाती हो क्या?” “सही बताऊँ तो डिवोर्स कोर्ट में आने से पहले ही हो चुका होता है। हम तो बस सरकारी स्टैम्प लगाने में और हिसाब-किताब करने में मदद करते हैं।”
Pg.14 “मेरे बारे में जानने लायक बस इतना है कि मुझे अपना काम बिल्कुल भी पसंद नहीं है। 2-3 सा ल अमेरिका में रहकर नौकरी कर चुका लेकिन कभी वहाँ मन नहीं लगा। अब अक्सर दो-तीन साल के लिए अमेरिका जाने के मौके आते हैं तो हर बार मना कर देता हूँ, पता नहीं क्यों। क्रिकेट मैच के अलावा टीवी बिल्कुल भी नहीं देखता। हर वीकेंड अकेले मूवी देखता हूँ, थिएटर देखना पसंद है। किताबें खरीदता ज्यादा हूँ पढ़ता कम। सुबह का अखबार बिना चाय के नहीं पढ़ पाता, आगे लाइफ में क्या करना है ज्यादा आइडिया नहीं है। अब मैंने इतना मुँह खोल ही दिया है तो तुम भी अपने बारे में कुछ बता ही दो।”
Pg.15 ये चंदर और सुधा की पहली मुलाकात थी। पहली हर चीज की बात हमेशा कुछ अलग होती है क्यूँकि पहला न हो तो दूसरा नहीं होता, दूसरा न हो तो तीसरा, इसीलिए पहला कदम ही जिंदगी भर रास्ते में मिलने वाली मंजिलें तय कर दिया करता है। पहली बार के बाद हम बस अपने आप को दोहराते हैं और हर बार दोहरने में बस वो पहली बार ढूँढ़ते हैं।
ट से टाटा, बाय-बाय
Pg.16 “किसी से मिलकर नाइस मीटिंग यू अगर कभी लगा भी करे तो बोला मत करो। कुछ चीजें बोलते ही कचरा हो जाती हैं।”
Sunday Ritual अगले Sunday से
Pg.17 “बहन, ये आदमी जो तुम्हारे साथ बैठा है न! ये बहुत ही कमीना इंसान है। मैं दो बार इसके बच्चे की माँ बन चुकी हूँ लेकिन देखो फिर भी तुमसे मिलने आ गया! इस आदमी को लड़की से बस तीन चीजें चाहिए, हवस, हवस, हवस।
Pg.17 “हाँ, और क्या तुम्हें इडियट बोला, मैं सबकुछ बर्दाश्त कर सकती हूँ बस ये नहीं सुन सकती कि कोई तुम्हें मेरे अलावा इडियट बोले, हा हा!”
प से play
Pg.19 मुंबई में ऐसे तो प्ले के कई अड्डे हैं। उनमें से एक बड़ा अड्डा पृथ्वी थिएटर है और दूसरा NCPA थिएटर। इन दोनों में से एक में अगर प्ले नहीं देखा तो समझिए मुंबई दर्शन अधूरा रह गया।
Pg.19 हर किसी को किसी बड़े आदमी ने काम देने का वादा किया होता है। मुंबई में लोग एक वादे एक मीटिंग के भरोसे जिंदगी गुजार देते हैं।
Pg.20 “सही में रो रही थी या एक्टिंग कर रही थी?” “तुम्हें क्या लगता है?” “मुझे लगता है कि बस रोते हुए ही हम एक्टिंग नहीं करते।” “I’m impressed. ”
Pg.21 “चालू हो गया न फ्लर्ट तुम्हारा! फ्लर्ट का भी एक रुल होता है जो भी बोलना है उसको किसी बहाने से नहीं direct बोल दिया करो, बेटर रहता है।”
Pg.21 “चलो पास में ही समंदर है, वहाँ चलते हैं।” “समंदर अच्छा लगता है तुम्हें?” “बहुत। और तुम्हें?” “मुझे पहाड़ ज्यादा पसंद हैं।”
Pg.22 “हाँ हूँ तो, हर कोई थोड़ा-सा पागल तो होता ही है।” “मैं तो नहीं हूँ पागल।” “तो ढूँढ़ो अपना पागलपन।” “उससे क्या होगा?” “थोड़ा-सा पागल हुए बिना इस दुनिया को झेला नहीं जा सकता।”
Pg.23 “टाटा! घर पहुँचकर SMS कर देना।”
“वाह! So caring! नहीं करूँगी SMS और कुछ नहीं होगा मुझे। Don’t worry, it was a day well spent, ये सब बोलकर चेप होने वाली बातें मत करो।”
इस मुलाकात के बाद दोनों अपने-अपने घर चले गए। चंदर जब कपड़े चेंज करके सोने जा रहा था तब सुधा का SMS आया।
“Reached safely, nice meeting. ”
इस SMS के कई जवाब चंदर ने अपने मोबाइल पर टाइप किए लेकिन कोई भी जवाब भेजा नहीं। जिंदगी की कोई भी शुरुआत हिचकिचाहट से ही होती है। बहुत थोड़ा- सा घबराना इसीलिए जरूरी होता है क्यूँकि अगर थोड़ी भी घबराहट नहीं है तो या तो वो काम जरूरी नहीं है या फिर वो काम करने लायक ही नहीं है।
ह से हैलो
Pg.23 सुधा ने शायद अपनी साइड से मना कर दिया था। इसलिए मम्मी का भी उस लड़की को लेकर कोई फोन नहीं आया।
Pg.24 एक बार ये भी लगा कि उस दिन कोई बात अधूरी रह गई। असल में बातें हमेशा अधूरी ही रहती हैं। ऐसा तो कभी होता ही नहीं कि हम बोल पाएँ कि मेरी उससे जिंदगी भर की सारी बातें पूरी हो गईं। हम सभी अपने-अपने हिस्से की अधूरी बातों के साथ ही एक दिन यूँ ही मर जाएँगे।
च से चुड़ैल
Pg.25 चंदर को ‘उस चुड़ैल से तो अच्छे ही हो तुम’ वाली लाइन में से केवल ‘अच्छे ही हो तुम’ बार-बार सुनाई पड़ रहा था। ऑटो में बाहर से हवा आकर धीरे-धीरे चंदर के चेहरे से होते हुए सुधा के चेहरे को टटोलकर देख रही थी। हवा खुश थी, ऑटो खुश था, सड़क खुश थी, शहर खुश था, चंदर थोड़ा-सा खुश था। चंदर की खुशी में थोड़ी-सी हिचकिचाहट बिखरी हुई थी।
द से दिमाग का दही
Pg.26 “तुम सोच रहे होगे न, कहाँ फँस गया!” “हाँ सोच तो रहा हूँ, बहुत दिनों से मैं ऐसे ही फँसना चाहता था किसी के साथ। बिल्कुल ऐसे ही रात में 2 बजे किसी लड़की के साथ। गुड कि तुम्हारे साथ फँसा।”
Pg.27 “मैगी कोई खराब बना सकता है क्या, तारीफ पसंद है मुझे लेकिन जब किसी काम की चीज के लिए की जाए।”
Pg.27 “ओह मैडम! आपको इतना परेशान होने की जरूरत नहीं। सुबह बाई आती है। तुम बता दो क्या खाओगी मैं सुबह बनवा दूँगा।” “अच्छा क्या बनाती है वो?” “सब एक जैसा खराब बनाती है।”
प से पोहा
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